Jaipur Literature Festival: रागों में रची साधना और परंपरा का जीवंत दस्तावेज़
नवल पांडेय। यतीन्द्र मिश्र की ‘नैनन में आन बान’ का विमोचन
Ananya soch: Jaipur Literature Festival
अनन्य सोच। Jaipur Literature Festival 2026 के तीसरे दिन आयोजित सत्र नैनन में आन बान शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत की समृद्ध विरासत, महान संगीत हस्तियों के जीवन, उनकी साधना और गायकी की परंपरा पर केंद्रित एक गहन और विचारोत्तेजक संवाद के रूप में सामने आया. यह सत्र लेखक, कवि और संगीत अध्येता यतीन्द्र मिश्र की पुस्तक नैनन में आन बान पर आधारित था, जिसमें भारतीय संगीत की परंपरा को साहित्यिक संवेदना के साथ दर्ज किया गया है.
संगीत, साहित्य और अनुभवों का संगम
सत्र का संचालन वैशाली माथुर ने किया, जबकि संवाद में समाजसेवी और लेखिका सुधा मूर्ति, प्रख्यात गायिका विद्या शाह और विदुषी कलाकार प्रेरणा श्रीमाली शामिल रहीं. मंच पर विचार, स्मृतियां और सुर एक साथ प्रवाहित होते दिखाई दिए. यह केवल एक पुस्तक विमोचन नहीं, बल्कि संगीत और परंपरा पर सामूहिक मंथन का अवसर बना.
घरानों की परंपरा और शुद्धता की बहस
सत्र की चर्चा का मुख्य केंद्र रहा — घरानों की परंपरा, गायकी की शुद्धता और समय के साथ उसमें आने वाले बदलाव. यतीन्द्र मिश्र ने कहा कि शास्त्रीय संगीत में शुद्धता का निर्धारण अक्सर गुरु के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है. कुछ गुरु परंपरागत शुद्धता पर जोर देते हैं, जबकि कुछ अन्य विभिन्न स्थानों और परंपराओं से श्रेष्ठ तत्व ग्रहण कर नई बंदिश या रचना को महत्व देते हैं. उनके अनुसार, ये दोनों दृष्टिकोण भारतीय संगीत की बहुलता और जीवंतता का अभिन्न हिस्सा हैं और किसी एक को दूसरे से श्रेष्ठ मानना उचित नहीं.
साधना से आगे बढ़ती गायकी
विद्या शाह ने शुद्धता की परिभाषा से आगे बढ़ते हुए साधना, अनुशासन और निरंतर अभ्यास पर बल दिया. उन्होंने कहा कि गुरु द्वारा दी गई रचना शिष्य के लिए केवल एक आधार होती है. शिष्य अपने रियाज़ और अनुभव से उसे आगे ले जाता है. संगीत में शिष्य की भूमिका केवल परंपरा को दोहराने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें अपनी साधना के माध्यम से नई ऊंचाई जोड़ना भी उतना ही आवश्यक है.
परंपरा और प्रयोग का संतुलन
प्रेरणा श्रीमाली ने परंपराओं के परिवर्तनशील स्वरूप पर विस्तार से बात की. उन्होंने कहा कि शिष्य चाहे तो गुरु से सीखी रचना को हूबहू प्रस्तुत कर सकता है, लेकिन सच्चा कलाकार वही है जो उसमें अपने दृष्टिकोण और जीवनानुभव को जोड़ता है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा प्रयोग केवल वही कलाकार कर सकता है, जो अपने घराने की परंपरा में पूरी तरह पारंगत हो. शुद्धता और प्रयोग को उन्होंने एक-दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि पूरक बताया.
सुरों में सजी संगीत विरासत
सत्र का एक विशेष आकर्षण रहा संगीत की जीवंत प्रस्तुति. विद्या शाह ने बनारस की सुप्रसिद्ध ठुमरी गायिका रसूलन बाई की ठुमरी प्रस्तुत की —
“नैनन में आन बान कौनसी पड़ी,
सांवरी सी सूरत मोहिनी सी मूरत श्याम सी खड़ी”.
इसके बाद उन्होंने दक्षिण भारतीय भक्ति परंपरा की रचना कृष्णानी बेगने बारो और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी विद्याधरी बाई की रचना —
“चुन चुन के फूल ले लो अरमाँ,
यह रह न जाये, ये हिन्द का बगीचा है गुलज़ार रह न जाये” प्रस्तुत की.
इन प्रस्तुतियों ने पूरे पंडाल को सुरों और भावनाओं से भर दिया.
केवल जीवनी नहीं, परंपरा का दस्तावेज़
पूरे सत्र में यह स्पष्ट हुआ कि नैनन में आन बान केवल संगीतकारों की जीवनियों का संग्रह नहीं है. यह भारतीय शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत की परंपरा, गुरु-शिष्य संबंध, साधना, प्रयोग और समय के साथ बदलते संगीतबोध का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी मार्गदर्शक साबित होगा.
नई पीढ़ी के लिए यतीन्द्र मिश्र का संदेश
सत्र के अंत में यतीन्द्र मिश्र ने नई पीढ़ी को सावधान करते हुए कहा कि संगीत और रागों के विषय में केवल गूगल पर भरोसा करना ठीक नहीं है, क्योंकि वहां कई गलत और अप्रामाणिक जानकारियां उपलब्ध हैं. सही जानकारी के लिए कलाकारों और सर्जकों से संवाद करना और प्रामाणिक पुस्तकों का अध्ययन करना आवश्यक है.