जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सुधा मूर्ति ने बच्चों को Partition की पीड़ा और सीख से रूबरू कराया

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सुधा मूर्ति ने बच्चों को Partition की पीड़ा और सीख से रूबरू कराया

Ananya soch

अनन्य सोच। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 के तीसरे दिन वेदांता फ्रंट लॉन पर आयोजित सत्र में राज्यसभा सांसद, समाजसेवी और प्रख्यात लेखिका सुधा मूर्ति की उपस्थिति सुबह का सबसे बड़ा आकर्षण बनी. खुले आसमान के नीचे आयोजित इस सत्र में बड़ी संख्या में बच्चे, अभिभावक और युवा श्रोता मौजूद रहे. सुधा मूर्ति ने अपनी नई चिल्ड्रेंस बुक The Magic of the Lost Earrings के माध्यम से 1947 के भारत-पाक विभाजन की कहानी को बच्चों के लिए संवेदनशील, मानवीय और सहज भाषा में प्रस्तुत किया. 

इतिहास को भूलना सबसे बड़ी भूल

जर्नलिस्ट और कल्चरल कमेंटेटर मंदिरा नायर के साथ संवाद में सुधा मूर्ति ने कहा कि इतिहास को भुलाया नहीं जाना चाहिए. उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा, “एक गलत खींची गई रेखा ने लाखों जिंदगियों की दिशा बदल दी. बच्चों को यह इतिहास पता होना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदी दोबारा न हो. Partition एक बड़ी गलती थी और इसे समझना बेहद जरूरी है.”
उनका कहना था कि बच्चों को इतिहास डराकर नहीं, बल्कि समझाकर बताया जाना चाहिए, ताकि वे मानवीय मूल्यों के साथ अतीत से सीख ले सकें. 

नूनी के सफर में बसा Partition का दर्द

सुधा मूर्ति ने बताया कि इस पुस्तक की मुख्य पात्र ‘नूनी’ उनकी पोती अनुष्का सुनक से प्रेरित है. दरअसल, यह कहानी उन्होंने अपनी पोती को Partition का अर्थ समझाने के उद्देश्य से लिखी. कहानी में नूनी छुट्टियों के दौरान गलती से मिली एक जोड़ी पुरानी बालियों के जरिए उज्जैन के घाटों से अमृतसर, दिल्ली और लंदन तक की यात्रा पर निकलती है. इस यात्रा के दौरान बच्चों को परिवार, इतिहास, विस्थापन, इमिग्रेशन और रिश्तों की जटिलताओं का अनुभव होता है. 
उन्होंने कहा कि एक छोटी-सी वस्तु के सहारे बड़ी ऐतिहासिक घटना को समझाना बच्चों के लिए अधिक प्रभावी होता है. 

दो बार विस्थापन का दर्द

सत्र के दौरान सुधा मूर्ति ने Partition के समय और उसके बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक के परिवार के अनुभवों को भी साझा किया. उन्होंने बताया कि उनके दामाद के परिवार को दो बार विस्थापन झेलना पड़ा—पहली बार भारत-पाक विभाजन के दौरान और दूसरी बार अफ्रीका में. उन्होंने इस अनुभव को “how heartbreaking” बताते हुए कहा कि यह दर्द केवल एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पीढ़ियों तक चलता है. 
उन्होंने विशेष रूप से सिंधी समुदाय की पीड़ा का उल्लेख करते हुए कहा कि विभाजन ने सिर्फ जमीन ही नहीं छीनी, बल्कि भाषा, संस्कृति और पहचान भी छीन ली, जिसका असर आज भी महसूस किया जाता है. 

बच्चों से संवाद और किताबों का महत्व

माता-पिता को संबोधित करते हुए सुधा मूर्ति ने कहा कि बच्चों पर अनावश्यक दबाव डालने के बजाय उनसे संवाद बनाए रखना चाहिए. उन्होंने स्क्रीन्स के बजाय फिजिकल बुक्स को प्राथमिकता देने पर जोर दिया। उनके अनुसार, किताबें बच्चों में धैर्य, संवेदनशीलता और गहराई से सोचने की क्षमता विकसित करती हैं, जबकि तुरंत मिलने वाली डिजिटल चीजें उन्हें सतही बना देती हैं. 

भावनात्मक और जीवंत माहौल

वेदांता फ्रंट लॉन का माहौल पूरे सत्र के दौरान उत्साह और भावनाओं से भरा रहा। सुधा मूर्ति की सादगी, सहज मुस्कान और अनुभवों की गहराई ने श्रोताओं को भावनात्मक रूप से छू लिया. कई उपस्थित लोगों ने इस सत्र को “इमोशनल और इंस्पायरिंग” बताया। तालियों की गड़गड़ाहट और बार-बार आए भावुक क्षणों ने पूरे वातावरण को जीवंत बनाए रखा. 

मूल्यों से जुड़ी बाल साहित्य की दृष्टि

सत्र के अंत में सुधा मूर्ति ने कहा कि बच्चों के लिए लिखी जाने वाली कहानियों का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि उन्हें मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं से जोड़ना होना चाहिए. The Magic of the Lost Earrings इसी सोच का विस्तार है। यह किताब बच्चों को यह सिखाती है कि मातृभूमि, मातृभाषा, परिवार और इतिहास से जुड़े रहना क्यों जरूरी है. 

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 में सुधा मूर्ति का यह सत्र बच्चों के लिए इतिहास को समझने का एक सशक्त माध्यम साबित हुआ, वहीं माता-पिता और युवा दर्शकों के लिए यह अनुभव लंबे समय तक याद रहने वाला बन गया.