आविष्कार जुगाड़ नहीं होता. रचना की आत्मा मनुष्य के भीतर धड़कती है — प्रसून जोशी

नवल पांडेय। JLF में ‘इमेजिन : द न्यू हॉरिज़न्स ऑफ़ क्रिएटिविटी’ सत्र में एआई, भाषा, माँ, बचपन और मानवीय संभावना पर गहन संवाद

आविष्कार जुगाड़ नहीं होता. रचना की आत्मा मनुष्य के भीतर धड़कती है — प्रसून जोशी

Ananya soch

अनन्य सोच। आविष्कार को जुगाड़ कहने की मानसिकता पर कड़ा सवाल उठाते हुए लेखक, गीतकार और रचनात्मक विचारक प्रसून जोशी ने कहा कि नए प्रयोग और नवाचार किसी भी सभ्यता की आत्मा होते हैं. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के फ्रंटलॉन में आयोजित सत्र “इमेजिन : द न्यू हॉरिज़न्स ऑफ़ क्रिएटिविटी” में वे लेखिका किश्वर देसाई के साथ संवाद कर रहे थे. यह बातचीत केवल आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और क्रिएटिविटी तक सीमित नहीं रही, बल्कि भाषा, संस्कृति, माँ, बचपन, स्मृतियों और मनुष्य की असीम संभावनाओं तक विस्तार लेती चली गई.

प्रसून जोशी ने कहा कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस में वास्तव में कुछ भी आर्टिफ़िशियल नहीं है. एआई के पास जो भी है, वह मनुष्य द्वारा दिया गया डेटा है, मानव अनुभवों का संकलन है. एआई उस पर काम करता है जो कहा जा चुका है, जबकि मनुष्य के पास वह सामर्थ्य भी है जो अभी कहा ही नहीं गया है. एआई व्यक्त के साथ चलता है, मनुष्य अव्यक्त के साथ. उन्होंने कहा कि दुनिया का सबसे सुंदर गीत अभी लिखा जाना है, सबसे सुंदर सपना अभी देखा जाना बाकी है. मानवीय क्षमता असीमित है और एआई केवल अभिव्यक्ति को थोड़ा पॉलिश कर सकता है. जोखिम लेना, लीक से हटकर सोचना और अनजाने में छलांग लगाना केवल मानव मस्तिष्क की विशेषता है.

कविता और रचना की प्रक्रिया पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि कविता कोई मंज़िल नहीं, बल्कि एक यात्रा है. उसकी मंज़िल रचनाकार के भीतर ही होती है. किसी रचना का महत्व जितना होता है, उसकी निर्माण प्रक्रिया उतनी ही महत्वपूर्ण होती है. उस प्रक्रिया का खुरदरापन, उसका संघर्ष और आनंद ही रचना की आत्मा है. यदि यह खुरदरापन समाप्त हो गया, यदि प्रक्रिया ही लुप्त हो गई, तो रचना भी अर्थहीन हो जाएगी और क्रिएटिविटी का मूल्य भी खत्म हो जाएगा.

एआई से गीत, संगीत और किताबें तैयार होने के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि इससे यह सिद्ध नहीं होता कि एआई एक अच्छा टूल है. रचना के एक्सटेंशन तक उसकी उपयोगिता मानी जा सकती है, लेकिन एक्सप्रेशन के स्तर पर उसे उपयोगी कहना ठीक नहीं. भावनाएँ आउटसोर्स नहीं की जा सकतीं. उन्होंने चिंता जताई कि एआई के कारण मानवीय आत्मविश्वास में कमी आ रही है, लेकिन स्वयं को वे इससे बिल्कुल भी चिंतित नहीं मानते. उनका कहना था कि यदि भीतर अनिश्चितता से जूझने की क्षमता है, तो कोई भी तकनीक नुकसान नहीं पहुँचा सकती.

उन्होंने अपने शब्दों में कहा — “नया सच नज़र से उतरने तो दो, मैं हूँ किस तरफ़ समझने तो दो.” उनका मानना है कि मस्तिष्क के परे भी एक दुनिया है. जब मनुष्य ध्यान और संवेदना के साथ उस दुनिया से जुड़ता है, तब ऐसे विचार जन्म लेते हैं जो उसने कभी सोचे भी नहीं होते. यूनिवर्स के साथ ट्यूनिंग बनने पर अव्यक्त यूनिवर्स से नया अनुभव मिलता है.

आविष्कार को जुगाड़ कहे जाने पर आपत्ति जताते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया के किसी भी विकसित समाज में नवाचार को इस नज़र से नहीं देखा जाता. हमें अपने जीवन में ऐसे जामवंत चाहिए, जो हमें हमारी शक्तियों का एहसास करा सकें.

अपने बचपन और परवरिश को याद करते हुए प्रसून जोशी ने बताया कि उनका जन्म उत्तराखंड के एक छोटे से गाँव में हुआ. पिता शिक्षा अधिकारी थे और चाहते थे कि वे पढ़-लिखकर बड़े अधिकारी बनें, जबकि माँ हमेशा कहती थीं कि जो मन कहे वही करना. इसी संस्कार ने उन्हें निराशा से दूर रखा. सत्रह वर्ष की उम्र में ही उनका पहला कविता संग्रह प्रकाशित हो गया. उन्होंने कहा कि नदी कभी पहाड़ नहीं बनती, वह हमेशा नदी ही रहती है. नदी के किनारे पड़े पत्थरों की तरह मनुष्य भी जीवन की ठोकरों से तराशा जाता है.

गाँव से मुंबई तक के सफ़र को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि एक हिंदी भाषी देहाती लड़का जब काम की तलाश में मुंबई पहुँचा, तो अंग्रेज़ी सुनकर कई बार लौट आता था. शुरुआती वर्षों में भाषा की झिझक बनी रही. भाषा व्यक्ति के आत्मविश्वास को हिला देती है. उन्होंने कहा कि भाषा एक ही होती है — वह आपकी माँ होती है. “भाषा मेरी हिंदी है, लेकिन अंग्रेज़ी मेरा हुनर है.” विज्ञापन की दुनिया में हिंदी को बोर्डरूम तक पहुँचाने के संघर्ष और “एचएमटी — हिंदी मीडियम टाइप” कहे जाने के दर्द को भी उन्होंने साझा किया.

माँ पर लिखे गीतों और कविताओं की चर्चा करते हुए उन्होंने ‘तारे ज़मीं पर’ का गीत “तुझे सब है पता है ना माँ”, ‘रंग दे बसंती’ का “लुका छुप्पी बहुत हुई” और ‘नीरजा’ फ़िल्म का “ऐसा क्यों माँ” सुनाया. उन्होंने कहा कि कविता के लिए अनुभूत सत्य अनिवार्य है.

माँ पर लिखी अपनी कविता की पंक्तियाँ और अन्य रचनाएँ सुनाते हुए उन्होंने श्रोताओं को भावुक कर दिया. सत्र के अंत में अपने मित्र पीयूष पांडेय को याद करते हुए उन्होंने गीत सुनाया — “चलो हँसी को रिवाज कर ले.”

यह सत्र केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं था, बल्कि मनुष्य होने, महसूस करने और रचने की शक्ति का उत्सव था. प्रसून जोशी ने एक बार फिर स्थापित किया कि तकनीक कितनी भी आगे बढ़ जाए, रचना की आत्मा मनुष्य के भीतर ही जीवित रहती है.