मशीन जवाब दे सकती है, लेकिन सोचने की क्षमता इंसान को खुद विकसित करनी होती है. विश्वनाथन आनंद
नवल शर्मा। चारबाग में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के तहत बच्चों से संवाद. शतरंज के जरिए जीवन के गहरे सबक
Ananya soch
अनन्य सोच। भारतीय शतरंज के सबसे बड़े नाम और पूर्व विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद ने कहा कि चैंपियन बनने का रास्ता केवल जीत के जश्न से नहीं गुजरता, बल्कि निरंतर अभ्यास, धैर्य और सीखने की भूख से होकर आगे बढ़ता है. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के अंतर्गत चारबाग में आयोजित लाइटनिंग किड सेशन में उन्होंने बच्चों और युवाओं से खुलकर संवाद किया और अपने जीवन तथा शतरंज के सफर से जुड़े अनुभव साझा किए. यह सत्र केवल खेल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सोच, अनुशासन और जीवन मूल्यों पर केंद्रित एक प्रेरक संवाद बन गया.
विश्वनाथन आनंद ने कहा कि आज के समय में तकनीक और मशीनें बहुत कुछ आसान बना रही हैं, लेकिन सोचने की क्षमता अब भी इंसान को खुद विकसित करनी होती है. उन्होंने बच्चों को समझाया कि केवल जवाब जान लेना काफी नहीं है, बल्कि यह समझना ज्यादा जरूरी है कि किसी निर्णय के पीछे तर्क क्या है. उनका कहना था कि सही सोच ही इंसान को भीड़ से अलग पहचान देती है.
अपने बचपन को याद करते हुए आनंद ने बताया कि उनका शतरंज सफर चेन्नई के एक छोटे से शतरंज हॉल से शुरू हुआ था. उस समय साधन सीमित थे, लेकिन जिज्ञासा और लगन बहुत मजबूत थी. बचपन में वे तेज चालों और तेजी से खेलने के लिए पहचाने जाते थे. यही आदत आगे चलकर उनकी पहचान बनी और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन करने का माध्यम बनी. उन्होंने कहा कि शुरुआती दिनों में उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि वे विश्व चैंपियन बनेंगे, लेकिन अभ्यास और सीखने की निरंतर इच्छा ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया.
उपन्यासकार राहुल भट्टाचार्य से बातचीत के दौरान आनंद ने कहा कि शतरंज उनके लिए केवल एक खेल नहीं रहा, बल्कि जीवन का शिक्षक बन गया. शतरंज ने उन्हें सोचने की गहराई, धैर्य रखने और सही समय पर सही निर्णय लेने की कला सिखाई. उनका मानना है कि शतरंज की बिसात पर लिया गया हर फैसला असल जीवन की परिस्थितियों से जुड़ा होता है. इसलिए शतरंज खेलने से व्यक्ति का व्यक्तित्व भी मजबूत होता है.
बच्चों को संबोधित करते हुए आनंद ने हार और असफलता पर खुलकर बात की. उन्होंने कहा कि हार से डरने के बजाय उसे सीख का हिस्सा मानना चाहिए. “मेरे करियर में भी कई मुकाबले ऐसे रहे, जहां मुझे हार का सामना करना पड़ा. एक समय ऐसा भी आया जब लगातार तीन मैच हारे, लेकिन मैंने हार को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया. मैंने अभ्यास को अपनी आदत बनाया और आगे बढ़ता रहा,” उन्होंने कहा. उनके अनुसार लगातार अभ्यास ही किसी भी खिलाड़ी और किसी भी व्यक्ति की असली पूंजी होती है.
कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर पूछे गए सवालों के जवाब में आनंद ने संतुलित दृष्टिकोण रखा. उन्होंने कहा कि एआई से जानकारी जरूर मिल सकती है, लेकिन हर उत्तर के पीछे का तर्क और मानवीय समझ विकसित करना ज्यादा जरूरी है. उन्होंने स्पष्ट कहा कि मशीन जवाब दे सकती है, लेकिन सोचने की क्षमता इंसान को खुद विकसित करनी होती है. उन्होंने बच्चों को सलाह दी कि तकनीक का उपयोग करें, लेकिन अपनी सोच और समझ को कमजोर न होने दें.
अनुशासन और मानसिक एकाग्रता पर बात करते हुए आनंद ने बताया कि अपने 35 वर्षों के लंबे करियर में उन्होंने कभी भी खेल शुरू होने से पहले या खेल के दौरान विरोधी से बातचीत नहीं की. उनके लिए मानसिक संतुलन और एकाग्रता सबसे महत्वपूर्ण रही है. उनका मानना है कि खेल के दौरान पूरी तरह वर्तमान में रहना और पूरे मन से खेल में डूब जाना ही असली ताकत है.
उन्होंने अपने जीवन में माता पिता की भूमिका को भी याद किया. आनंद ने कहा कि शतरंज से उनका जुड़ाव उनकी मां की वजह से हुआ. वही उन्हें टूर्नामेंट में लेकर जाती थीं और हर कदम पर उनका साथ देती थीं. उन्होंने कहा कि माता पिता का भरोसा और समर्थन किसी भी बच्चे के करियर को सही दिशा देता है और आत्मविश्वास बढ़ाता है.
चारबाग में आयोजित यह सत्र बच्चों के लिए केवल शतरंज की तकनीक सीखने का अवसर नहीं था, बल्कि यह जीवन को समझने का भी एक महत्वपूर्ण अनुभव बना. जिज्ञासा, अनुशासन, अभ्यास और सीखने की भूख जैसे मूल्यों को विश्वनाथन आनंद ने बेहद सहज और सरल शब्दों में बच्चों के सामने रखा.
यह संवाद इस बात का संदेश बन गया कि चैंपियन केवल पदक या खिताब से नहीं बनता, बल्कि मजबूत सोच, संतुलित मन और लगातार सीखते रहने की आदत से बनता है. विश्वनाथन आनंद का यह संवाद खेल की सीमाओं से आगे बढ़कर बच्चों के लिए जीवन के गहरे पाठ पढ़ाने वाला अनुभव साबित हुआ.