अक्षय तृतीया: दान, तप और अहिंसा का पावन संदेश
भगवान ऋषभदेव के प्रथम पारणा दिवस की स्मृति में मनाया जाता है महापर्व
अनन्य सोच। जैन धर्म में अक्षय तृतीया का विशेष महत्व है, जिसे दान, तप और त्याग की परंपरा का आरंभ दिवस माना जाता है। इस पावन अवसर पर शहर सहित प्रदेशभर में विभिन्न धार्मिक आयोजन श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न हुए। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि समाज को सेवा और सदाचार का संदेश भी देता है।
राजस्थान जैन युवा महासभा जयपुर के प्रदेश महामंत्री विनोद जैन कोटखावदा ने बताया कि जैन धर्म के प्रवर्तक एवं प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव को वैशाख मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को हस्तिनापुर में इक्षु रस का प्रथम आहार प्राप्त हुआ था। इसी घटना के साथ दान-तीर्थ की परंपरा का शुभारंभ हुआ और इस दिन को अक्षय तृतीया के रूप में मनाया जाने लगा।
उन्होंने बताया कि भगवान ऋषभदेव ने जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर अहिंसा, त्याग और तपस्या का संदेश जन-जन तक पहुंचाया। छह माह की कठोर तपस्या के बाद जब वे आहार ग्रहण करने नगर पहुंचे, तब प्रारंभ में किसी को दिगम्बर मुनि की आहार विधि का ज्ञान नहीं था। ऐसे में राजा श्रेयांस को पूर्व जन्म का स्मरण हुआ और उन्होंने नवधा भक्ति के साथ विधिपूर्वक आहार अर्पित किया, जिसे जैन परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
इसी घटना की स्मृति में अक्षय तृतीया को भगवान ऋषभदेव के पारणा दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व समाज को त्याग, संयम और सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। जैन धर्मावलंबी इस दिन दान-पुण्य, तप और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से आत्मशुद्धि का संकल्प लेते हैं।
अक्षय तृतीया का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना प्राचीन काल में था। यह पर्व हमें मानवता, करुणा और सद्भाव के मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित करता है, जिससे समाज में शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।