हाईकोर्ट के सख्त तेवर: डिजिटल अरेस्ट केस में डीजीपी-एसपी तलब, पीड़िता को सम्मानजनक सुविधा के आदेश
न्यायपालिका के बड़े फैसले—वृद्धा को सहारा, कर्मचारी को हक और सामुदायिक जमीन पर समान अधिकार का संदेश
Ananya soch: Rajasthan High Court News
अनन्य सोच। Digital Arrest Case India: राजस्थान हाईकोर्ट ने एक साथ कई अहम मामलों में सख्त रुख अपनाते हुए न्याय और संवेदनशीलता का मजबूत संदेश दिया है। 80 लाख रुपए के डिजिटल अरेस्ट प्रकरण में अदालत ने डीजीपी और साइबर क्राइम एसपी को 27 मार्च को वर्चुअल रूप से तलब किया है, वहीं जांच अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के निर्देश दिए हैं।
83 वर्षीय पीड़िता, जो व्हीलचेयर पर अपने दिव्यांग भतीजे के साथ अदालत पहुंची, की स्थिति पर अदालत ने गहरी चिंता जताई। अदालत ने इसे “अंतरात्मा को झकझोरने वाला मामला” बताते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए कि यदि पीड़िता जयपुर में रुकना चाहें, तो उन्हें उच्च गुणवत्ता वाला आवास और भोजन उपलब्ध कराया जाए—जिसका पूरा खर्च सरकार वहन करेगी।
सुनवाई के दौरान जहां आरोपी पक्ष ने 10 लाख रुपए में समझौते का हवाला देकर जमानत की मांग की, वहीं पीड़िता ने खुद को मजबूर और न्याय से वंचित बताया। इस पर अदालत ने मामले को गंभीरता से लेते हुए शीर्ष अधिकारियों को तलब किया।
कर्मचारी अधिकारों पर ऐतिहासिक फैसला (Employee Regularization Judgment)
एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में हाईकोर्ट ने 28 वर्षों तक सेवा देने के बावजूद नियमितिकरण से वंचित कर्मचारी के पक्ष में निर्णय दिया। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिए कि कर्मचारी की प्रारंभिक नियुक्ति के 10 वर्ष बाद से सेवा नियमित मानते हुए उसे रिटायरमेंट लाभ प्रदान किए जाएं।
सामुदायिक भूमि पर समान अधिकार अनिवार्य (Community Land Law India)
जयपुर की एक सिविल अदालत ने स्पष्ट किया कि सामुदायिक केंद्र के लिए आवंटित भूमि का उपयोग किसी एक धर्म विशेष के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने संबंधित संस्थान को निर्देश दिए कि वह सभी समुदायों के लिए समान रूप से सुविधाएं उपलब्ध कराए और किसी विशेष धार्मिक गतिविधि तक सीमित न रखे।
पॉक्सो मामले में कठोर सजा (POCSO Case Verdict)
इसी क्रम में, पॉक्सो अदालत ने नाबालिग के अपहरण और दुष्कर्म के दोषी को 20 साल की सजा सुनाई, साथ ही 1.75 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया। यह फैसला महिला सुरक्षा के प्रति न्यायपालिका की गंभीरता को दर्शाता है।
इन सभी फैसलों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि न्यायपालिका समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।