“अस्सी के आचार्य”: नंदकिशोर आचार्य का सादगी और साहित्य से सराबोर सम्मान समारोह

“अस्सी के आचार्य”: नंदकिशोर आचार्य का सादगी और साहित्य से सराबोर सम्मान समारोह

Ananya soch

अनन्य सोच। सुप्रसिद्ध कवि, आलोचक, नाटककार, अनुवादक और गांधीवादी चिंतक नंदकिशोर आचार्य का अस्सीवाँ जन्मदिन समारोह  “चाँद आकाश गाता है” नाम से आज रविवार को गांधीवादी विचारों पर चलने वाली संस्था राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति के तत्वावधान में मनाया गया. समारोह में देशभर से आचार्य जी के प्रशंसक उपस्थित हुए. बड़ी संख्या में उनके गृहनगर बीकानेर से आए उनके शुभचिंतकों ने आचार्यजी का स्वागत अभिनंदन किया. 

इस अवसर पर दिल्ली से प्रसिद्ध आलोचक डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल, सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार गोविन्द मिश्र, पद्मश्री से सम्मानित शायर शीन काफ़ निज़ाम, पद्मश्री डॉ डी आर मेहता, कवि -लेखक नंद भारद्वाज, डॉ हेतु भारद्वाज, डॉ दुर्गा प्रसाद अग्रवाल, आलोचक राजाराम भादू, राजेन्द्र उपाध्याय, गिर्राज मोहता व पत्रकार -संपादक आनंद जोशी सहित अनेक वक्ताओं ने आचार्य जी के कृतित्व और व्यक्तित्व पर अपने विचार व्यक्त किए. 
शायर शीन काफ़ निज़ाम ने कहा कि नंदकिशोर आचार्य ने स्वयं को शब्द को समर्पित कर दिया है. वे हमेशा लिखते-पढ़ते रहते हैं. शब्द उनके लिए सबसे अहम् है. वे प्रेम से भी अधिक शब्दों को  प्रेम करते हैं. शब्द कवि का ईश्वर होता है. उन्होंने कहा कि कवि प्रभात त्रिपाठी ने आचार्य को मुकम्मल कवि बताया है. वे मुकम्मल कवि इसलिए हैं क्योंकि वे कहते हैं कविता ख़ुद मुझसे लिखवाती है. गांधी के विचारों पर चलने वाले आचार्य गांधी जी की ही तरह वे भी अपनी सारी खिड़कियां खुली रखते हैं. उनकी कविता में फ़लसफ़ा , सोशियोलॉजी, मनोविज्ञान आदि शामिल होते हैं. 
उन्होंने आचार्य की एक कविता का उदाहरण देते हुए कहा कि “ लामकाँ है भाषा , जिसमें नहीं बन सकता मकाँ कवि का”. कवि कहते हैं “मैं तुम्हारी खामोशी को अपने शब्दों में सुनना चाहता हूँ. वो क्या है जो मेरे शब्दों से परे है, मैं उसे बस एक बार छू लेना चाहता हूँ. कवि का यह छू लेना ही उसकी कविता की संवेदना है. उन्होंने कहा की इल्म का इत्र होती है कविता. अच्छी कविता शहद की तरह होती है जिसमें कई फूलों का रस शामिल होता है. 
वरिष्ठ आलोचक राजाराम भादू ने कहा कि आचार्य जी एक बड़े कवि के साथ ही एक शिक्षाविद भी हैं. शिक्षा पूरे जीवन चलती है। वे आलोचक हैं और एक आलोचक के लिए संस्कृति को समझना भी ज़रूरी होता है. आचार्यजी ने संस्कृति पर कई किताबें लिखी हैं. उन्होंनें नाटकों और साहित्यिक आलोचना पर भी  विविध काम किया है. प्राकृत भारती के लिए किया गया उनका “अहिंसा विश्वकोश” का काम एक संस्था के समान है. अहिंसा और शांति पर उनके संपादन में इक्यावन किताबों का प्रकाशन हुआ है. 
उन्होंने कहा कि आचार्य जी विधाओं की स्वतंत्रता के हिसाब से काम करते हैं. उनकी दार्शनिकता उनकी रचनाओं में स्पष्ट होती है. 
इस अवसर पर कवि-लेखक नंद भारद्वाज ने कहा कि नंदकिशोर आचार्य का हिंदी साहित्य के क्षेत्र में आना हिंदी के लिए गर्व की बात है. वे चौथा सप्तक के कवि हैं और अब तक उनके दो दर्जन से भी अधिक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. वे हिंदी के साथ ही राजस्थानी के भी प्रकांड विद्वान हैं. आचार्य जी अज्ञेय को समझने वाले और उनके साथ बराबर खड़े रहने वाले अकेले साहित्यकार हैं. उनकी अप्रोच बिल्कुल भिन्न है. 
उन्होंने कहा कि पारिवारिक मानवीय रिश्तों की एक मर्यादा होती है. उनकी सोच का आधार गांधीवाद है. वे राज्यविहीन समाज की व्याख्या करते हैं. “अहिंसा विश्वकोश” जैसा उनके द्वारा किया गया महत्ती कार्य वर्षों तक याद किया जाता रहेगा. 
गांधीवादी विचारक और समाजसेवी डी आर मेहता ने कहा कि आज बहुत महान दिन है कि आज एक ऐसे विशिष्ट साहित्यकार और गांधीवादी दार्शनिक का सम्मान किया गया है. वे “अहिंसा विश्वकोश” के ज़रिए प्राकृत भारती से जुड़े और अहिंसा और शांति पर उनके संपादन में इक्यावन किताबें प्रकाशित हुई हैं. उन्होंने कहा कि अहिंसा परमोधर्म विश्वव्यापी दर्शन है. इसे केवल जैन धर्म से जोड़कर इसे संकुचित नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह केवल जैन दर्शन का ही सिद्धांत नहीं है बल्कि विश्व शांति का प्रतीक है. उन्होंने कहा कि आचार्यजी धार्मिक नहीं है पर आध्यात्मिक हैं. उन्होंने आग्रह किया कि आचार्य जी को अब अपनी आत्मकथा लिखनी चाहिए और साथ ही अहिंसा और शांति पर किए गए उनके काम का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया जाना चाहिए ताकि यह अधिक विस्तारित हो सके. 
इस अवसर पर डॉ दुर्गा प्रसाद अग्रवाल, आनंद जोशी, राजेन्द्र उपाध्याय, गिर्राज मोहता, आदिल रज़ा मंसूरी, अंजू ढड्डा मिश्रा आदि ने भी अपने विचार रखे.