Four Stars of Destiny: सीमा पर संघर्ष से संसद तक गूंज. चार सितारों की कहानी या राष्ट्रीय सुरक्षा की कसौटी? जनरल एमएम नरवणे की आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ पर बढ़ता विवाद और अटकी मंजूरी!
Ananya soch: General Manoj Mukund Naravane autobiography
अनन्य सोच। Four Stars of Destiny book controversy:
पूर्व भारतीय थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की आत्मकथा ‘Four Stars of Destiny’ इन दिनों देश की सियासत, सुरक्षा प्रतिष्ठान और बौद्धिक जगत में तीखी बहस का विषय बनी हुई है. दिसंबर 2019 से अप्रैल 2022 तक उनके सेना प्रमुख कार्यकाल पर आधारित यह किताब (India China border and Galwan clash) भारत–चीन सीमा पर हुए तनाव, पूर्वी लद्दाख में गलवान झड़प और अग्निवीर योजना जैसे संवेदनशील मुद्दों को सामने लाने वाली मानी जा रही है. हालांकि, अब तक इस किताब को आधिकारिक प्रकाशन की मंजूरी नहीं मिली है और यह रक्षा मंत्रालय की समीक्षा प्रक्रिया में अटकी हुई है.
जनरल नरवणे का जन्म 22 अप्रैल 1960 को पुणे में हुआ. उनके पिता भारतीय वायुसेना में अधिकारी थे. चार दशकों से अधिक के सैन्य करियर में उन्होंने देश के कई रणनीतिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं. उनके नेतृत्व काल में कोविड-19 महामारी के दौरान सैनिकों की सुरक्षा और परिचालन क्षमता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती रही. इसके साथ ही पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ हुए सैन्य गतिरोध में भारतीय सेना की मजबूत रणनीति और जवाबी तैयारियां उनकी प्रमुख उपलब्धियों में गिनी जाती हैं.
यह किताब प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान पेंग्विन रैंडम हाउस द्वारा प्रकाशित की जानी थी. मूल रूप से इसे 2024 के शुरुआत में बाजार में लाने की योजना थी.(Agnipath Scheme debate) दिसंबर 2023 में समाचार एजेंसी पीटीआई द्वारा किताब के कुछ अंश प्रकाशित किए गए, जिनमें अग्निवीर योजना को लेकर की गई टिप्पणियों ने खासा राजनीतिक और सार्वजनिक ध्यान खींचा.
(Freedom of expression vs national security) प्रकाशन में देरी का कारण भारत में लागू सरकारी नियम हैं. वरिष्ठ सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों को यदि अपनी किताबों में सैन्य रणनीति, ऑपरेशंस या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जानकारियां शामिल करनी हों, तो उन्हें पहले सरकारी अनुमति लेनी होती है. यह प्रावधान Central Civil Services Pension Rules 2021 और उससे जुड़े संशोधनों के तहत लागू है. रक्षा मंत्रालय किताब की लाइन-बाय-लाइन समीक्षा कर रहा है, ताकि कोई गोपनीय या संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक न हो. जनरल नरवणे का कहना है कि उन्होंने अपना दायित्व निभाते हुए पांडुलिपि पब्लिशर को सौंप दी थी और मंजूरी की जिम्मेदारी रक्षा मंत्रालय व पब्लिशर की है. अक्टूबर 2025 में उन्होंने इस प्रक्रिया को “aged wine की तरह maturing” बताते हुए कहा था कि किताब लंबे समय से समीक्षा में है.
हाल ही में लोकसभा में भी यह किताब राजनीतिक बहस का केंद्र बनी. विपक्ष ने इसके अप्रकाशित अंशों का हवाला दिया, जबकि सरकार ने संसदीय नियम 349 और 353 के तहत आपत्ति जताई. फिलहाल किताब “under review” है, अमेज़न जैसी वेबसाइटों पर प्री-ऑर्डर रद्द हो चुके हैं और स्टेटस “currently unavailable” दिख रहा है. यह पूरा मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन की एक अहम मिसाल के रूप में देखा जा रहा है.
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